Pratha Pratigya

प्रथा प्रतिज्ञा

न्यूज रिपोर्ट राकेश कुमार

राष्ट्रीय फाइलेरिया दिवस (11 नवंबर) पर विशेष
आईडीए अभियान के दौरान फाईलेरिया से बचाव की दवा जरुर खाएं

रायबरेली।फाइलेरिया जैसे रोग से मुक्ति दिलाने के लिए स्वास्थ्य विभागलगातार प्रयासरत है। नाइट सर्वे और रोग प्रबंधन और प्रशिक्षण के माध्यम से लोगों को जागरूक बनाया जा रहा है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. वीरेंद्र सिंह ने बताया कि फ़ाइलेरिया जिसे हाथी पाँव भी कहते हैं | यह मच्छरजनित बीमारी है जो कि गंदे ठहरे पानी में मच्छरों के पनपने से होती है | इस बीमारी से बचाव ही इसका इलाज है | इस बीमारी में लसिका ग्रंथियां (लिम्फ़ नोड) प्रभावित होती हैं और एक बार जब यह रोग हो जाता है तो यह पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाता है | दवा के सेवन से माइक्रो फाइलेरिया को खत्म कर रोग को बढ़ने से रोक सकते है | यह बीमारी व्यक्ति को आजीवन विकलाँग बना देती है |
फ़ाईलेरिया से बचाव के लिए सरकार द्वारा साल में एक बार आईवरमेक्टिन, डाईइथाइलकार्बामजीन एल्बेंडाज़ोल (आइडीए) अभियान चलाया जाता है | इसके तहत स्वास्थ्य कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को आईवरमेक्टिन, एल्बेंडाज़ोल और डाईइथाइलकार्बामजीन की गोलियाँ खिलाते हैं | साल में एक बार और लगातार तीन साल तक इस दवा का सेवन करने से इस बीमारी से बचा जा सकता है |दो साल से कम आयु के बच्चों, गर्भवती और गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों को इस दवा का सेवन नहीं करना होता है | इन दवाओं के सेवन का कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है | कुछ लोगों में दवा के सेवन के बाद चक्कर आना, जी मिचलाना जैसे दुष्प्रभाव दिखाई देते हैं लेकिन इससे घबराने की जरूरत नहीं है | यह अपने आप ठीक हो जाते हैं | इसका मतलब यह होता है कि उसके शरीर में फाइलेरिया के जीवाणु हैं | फाइलेरिया के जीवाणु व्यक्ति के शरीर में पाँच से 15 साल तक सुप्तावस्था में रहते हैं और अनुकूल परिस्थिति आने में सक्रिय हो जाते हैं |
जिला मलेरिया अधिकारी भीखुल्लाह ने बताया कि फाइलेरिया रोगियों की पहचान के लिए साल में एक बार नाइट ब्लड सर्वे किया जाता है | रात में लोगों के खून के नमूने की जांच कर संक्रमण की स्थिति का पता लगाया जाता है क्योंकि फाइलेरिया के जीवाणु, जिन्हें हम माइक्रोफाइलेरिया कहते हैं वह रात में सक्रिय होते हैं। इसलिए फाइलेरिया के मरीजों को चिन्हित करने का काम रात में ही किया जाता है |
जिला मलेरिया अधिकारी ने बताया कि वर्ष 2021 में 13,050 और वर्ष 2020 में 11,706 फाइलेरिया (लिम्फोडिमा) मरीज मिले हैं। वर्तमान में जनपद में 955 लिम्फोडिमा (हाथीपांव) और 961 हाइड्रोसील के मरीजों का इलाज चल रहा है। पिछले माह फाइलेरिया के 14 मरीजों को रोग प्रबंधन का प्रशिक्षण देते हुए किट बांटी जा चुकी है।
जिला मलेरिया अधिकारी ने बताया कि यदि ज्यादा दिनों तक बुखार रहे, पुरुष के जननांग में या महिलाओं के स्तन में दर्द या सूजन रहे और खुजली हो, हाथ-पैर में भी सूजन या दर्द रहे तो यह फाइलेरिया होने के लक्षण हैं। तुरंत चिकित्सक से संपर्क कर जाँच कराएँ। मरीज नियमित रूप से बताये गए दवा का सेवन करें और आईडीए अभियान के दौरान अपने परिवार और आसपास के लोगों को दवा खाने के लिए प्रेरित करें।
फाइलेरिया मच्छरों के काटने से होता है। मच्छर गंदगी में पैदा होते हैं। इसलिए इस रोग से बचना है, तो आस-पास सफाई रखना जरूरी है। दूषित पानी, कूड़ा जमने ना दें, जमे पानी पर कैरोसीन तेल छिड़क कर मच्छरों को पनपने से रोकें, सोने के समय मच्छरदानी का उपयोग करें।

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